All Indian Dynasties Timeline: 600 BC to 1947 (Complete)

Explore the vast history of India from Bimbisara (600 BC) to the British Raj (1947 AD). A comprehensive chronological guide covering major dynasties.

Timeline of Indian Dynasties

The history of the Indian subcontinent is vast, ancient, and incredibly diverse. From the rise of the Mahajanapadas around 600 BC (the time of Bimbisara) to the end of colonial rule in 1947, this land has witnessed the rise and fall of countless magnificent dynasties. Whether it was the golden age of the Mauryas and Guptas, the valor of the Rajputs, the Delhi Sultanate and the Mughal Empire, or the resistance of the Marathas—every era has its own indelible saga.

Historical timeline major Indian dynasties from Bimbisara and Ashoka to Mughal rulers and symbols of the British Raj.

Often, students preparing for competitive exams and history enthusiasts struggle to find a correct and organized chronological timeline of all these rulers and dynasties in one single place. To solve this problem, we have presented the major historical milestones of India through easy-to-understand tables in this blog post.

For those who want to know which major dynasties ruled over the vast territory of India throughout history, for their convenience, we are providing almost everything here in one single place after conducting our own thorough online research.

In the tables that follow, you will find detailed information about the rulers of ancient, medieval, and modern India, their reigns, and key facts.

1. हर्यक वंश (544 ई.पू. - 412 ई.पू.) | शासन स्थान: राजगृह और पाटलिपुत्र (मगध)

शासक का नाम व समय पिता का नाम / पूर्वाधिकारी विशिष्ट उपलब्धि या तथ्य
बिम्बिसार
(544 - 492 ई.पू.)
भट्टिय (संस्थापक) वैवाहिक संधियों से साम्राज्य विस्तार। बुद्ध के समकालीन।
अजातशत्रु
(492 - 460 ई.पू.)
बिम्बिसार पिता की हत्या कर गद्दी ली। प्रथम बौद्ध संगीति का आयोजन।
उदयन
(460 - 444 ई.पू.)
अजातशत्रु पिता को मारा। गंगा-सोन संगम पर पाटलिपुत्र नगर बसाया।
अनिरुद्ध, मुंड, नागदशक
(444 - 412 ई.पू.)
उदयन के वंशज अंतिम शासक नागदशक की हत्या उसके मंत्री शिशुनाग ने की।

2. शिशुनाग वंश (412 ई.पू. - 344 ई.पू.) | शासन स्थान: वैशाली और पाटलिपुत्र

शासक का नाम व समय पिता का नाम / पूर्वाधिकारी विशिष्ट उपलब्धि या तथ्य
शिशुनाग
(412 - 394 ई.पू.)
(नागदशक का अमात्य) अवंती राज्य को हराकर मगध में मिलाया।
कालाशोक
(394 - 366 ई.पू.)
शिशुनाग द्वितीय बौद्ध संगीति कराई।
नन्दिवर्धन (महानंदिन)
(366 - 344 ई.पू.)
कालाशोक के 10 पुत्रों में अंतिम इसकी हत्या महापद्म नंद ने कर दी।

3. नंद वंश (344 ई.पू. - 322 ई.पू.) | शासन स्थान: पाटलिपुत्र (मगध)

शासक का नाम व समय पिता का नाम / पूर्वाधिकारी विशिष्ट उपलब्धि या तथ्य
महापद्म नंद
(344 - 336 ई.पू.)
(शिशुनाग वंश का अंत किया) कलिंग जीता, 'एकराट' की उपाधि ली।
पंडुक से कैवर्त तक
(336 - 326 ई.पू.)
महापद्म नंद के पुत्र बारी-बारी से अल्पकाल के लिए शासन किया।
धनानंद
(326 - 322 ई.पू.)
महापद्म नंद का अंतिम पुत्र सिकंदर का समकालीन। चाणक्य ने चंद्रगुप्त के साथ मिलकर इसे मारा।

4. मौर्य वंश (322 ई.पू. - 185 ई.पू.) | शासन स्थान: पाटलिपुत्र (संपूर्ण अखंड भारत)

शासक का नाम व समय पिता का नाम / पूर्वाधिकारी विशिष्ट उपलब्धि या तथ्य
चंद्रगुप्त मौर्य
(322 - 298 ई.पू.)
(नंद वंश का अंत किया) चाणक्य के साथ प्रथम अखंड साम्राज्य बनाया। सेल्युकस को हराया।
बिन्दुसार
(298 - 273 ई.पू.)
चंद्रगुप्त मौर्य 'अमित्रघात'। साम्राज्य दक्षिण भारत तक फैलाया।
अशोक महान
(268 - 232 ई.पू.)
बिन्दुसार कलिंग युद्ध। बौद्ध धर्म अपनाया, धम्म का प्रचार किया।
कुणाल, दशरथ, संप्रति, शालिशुक अशोक के उत्तराधिकारी साम्राज्य का विभाजन हुआ और शक्ति कमजोर पड़ी।
बृहद्रथ
(215 - 185 ई.पू.)
शतधन्वन का पुत्र अंतिम मौर्य सम्राट, सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने हत्या की।

5. शुंग वंश (185 ई.पू. - 73 ई.पू.) | शासन स्थान: पाटलिपुत्र और विदिशा

शासक का नाम व समय पिता का नाम / पूर्वाधिकारी विशिष्ट उपलब्धि या तथ्य
पुष्यमित्र शुंग
(185 - 149 ई.पू.)
(बृहद्रथ का सेनापति) यवनों को हराया, दो अश्वमेध यज्ञ कराए।
अग्निमित्र, वसुज्येष्ठ, भद्रक
(149 - 83 ई.पू.)
पुष्यमित्र के वंशज कालिदास के 'मालविकाग्निमित्रम्' का नायक अग्निमित्र था।
देवभूति
(83 - 73 ई.पू.)
भागभद्र का उत्तराधिकारी अंतिम शासक, मंत्री वासुदेव कण्व ने दासी के माध्यम से हत्या कराई।

6. कण्व वंश (73 ई.पू. - 28 ई.पू.) | शासन स्थान: पाटलिपुत्र (मगध)

शासक का नाम व समय पिता का नाम / पूर्वाधिकारी विशिष्ट उपलब्धि या तथ्य
वासुदेव कण्व
(73 - 64 ई.पू.)
(देवभूति का मंत्री) ब्राह्मण वंश, मगध तक सीमित रहा।
भूमिमित्र, नारायण, सुशर्मन
(64 - 28 ई.पू.)
वासुदेव के वंशज अंतिम शासक सुशर्मन को सातवाहन राजा सिमुक ने मार डाला।

7. गर्दभिल्ल वंश (लगभग 70 ई.पू. - 1 ईस्वी) | शासन स्थान: उज्जैन (मालवा)

शासक का नाम व समय पिता का नाम / पूर्वाधिकारी विशिष्ट उपलब्धि या तथ्य
गर्दभिल्ल (दर्पण)
(70 ई.पू. के आसपास)
स्थानीय मालवा शासक शकों ने हमला कर इन्हें बंदी बना लिया था।
सम्राट विक्रमादित्य
(57 ई.पू.)
गर्दभिल्ल शकों को भगाया, 57 ई.पू. में 'विक्रम संवत' चलाया। अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि की खोज व जीर्णोद्धार किए। विक्रम-बेताल की कहानी से सम्बंध।

8. सातवाहन वंश (60 ई.पू. - 225 ई.) | शासन स्थान: प्रतिष्ठान (महाराष्ट्र)

शासक का नाम व समय पिता का नाम / पूर्वाधिकारी विशिष्ट उपलब्धि या तथ्य
सिमुक
(230-207 ई.पू.)
(संस्थापक)कण्व वंश के अंतिम राजा सुशर्मा की हत्या कर सातवाहन वंश की नींव रखी।
कान्हा (कृष्ण)
(207-189 ई.पू.)
सिमुक का भाईसाम्राज्य का विस्तार नासिक तक किया। इनके समय शिलालेखों की परंपरा शुरू हुई।
शातकर्णी प्रथम
(180-170 ई.पू.)
कान्हा का पुत्रदो अश्वमेध यज्ञ किए। 'दक्षिणापथपति' की उपाधि ली। रानी नगनिका का नानाघाट अभिलेख प्रसिद्ध है।
राजा हाल
(20-24 ई.)
वंशजमहान कवि। प्राकृत भाषा में 'गाथासप्तशती' की रचना की। (इसके बाद शकों का प्रभाव बढ़ा)
गौतमीपुत्र शातकर्णी
(106-130 ई.)
शिवस्वातिवंश का महानतम राजा। शक राजा नहपान को हराया। इन्हें 'एकमात्र ब्राह्मण' कहा गया। शीशे के सिक्के चलाए।
वशिष्ठिपुत्र पुलमावी
(130-154 ई.)
गौतमीपुत्रआंध्र प्रदेश पर विजय पाई, इसलिए इन्हें 'प्रथम आंध्र सम्राट' कहा जाता है। अमरावती स्तूप का विस्तार किया।
यज्ञ श्री शातकर्णी
(165-194 ई.)
वंशजअंतिम शक्तिशाली राजा। समुद्री व्यापार प्रेमी। इनके सिक्कों पर दो पतवारों वाले जहाज का चित्र अंकित है।

9. कुषाण वंश (30 ई. - 375 ई.) | शासन स्थान: पुरुषपुर (पेशावर) और मथुरा

शासक का नाम व समय पिता का नाम / पूर्वाधिकारी विशिष्ट उपलब्धि या तथ्य
कुजुल और विम कडफिसेस
(30 - 78 ई.)
यूची कबीले से भारत में बड़े पैमाने पर सोने के सिक्के चलाए।
कनिष्क
(78 - 144 ई.)
विम कडफिसेस 78 ई. में 'शक संवत' चलाया। सिल्क रूट पर कब्जा।
हुविष्क, वासुदेव प्रथम
(144 - 375 ई.)
कनिष्क के वंशज मथुरा कला का विकास, ससानिड हमलों से पतन।

10. वाकाटक वंश (250 ई. - 500 ई.) | शासन स्थान: विदर्भ और दक्कन

शासक का नाम व समय पिता का नाम / पूर्वाधिकारी विशिष्ट उपलब्धि या तथ्य
विंध्यशक्ति, प्रवरसेन प्रथम
(250 - 330 ई.)
(संस्थापक) प्रवरसेन ने 4 अश्वमेध यज्ञ किए, 'सम्राट' की उपाधि ली।
रुद्रसेन द्वितीय
(385 - 390 ई.)
पृथ्वीसेन प्रथम चंद्रगुप्त द्वितीय की पुत्री 'प्रभावती गुप्ता' से विवाह।
प्रवरसेन द्वितीय
(400 - 440 ई.)
रुद्रसेन द्वितीय 'सेतुबंध' की रचना की। अजंता गुफाओं को संरक्षण।

11. गुप्त राजवंश (319 ई. - 550 ई.) | शासन स्थान: पाटलिपुत्र और उज्जैन

शासक का नाम व समय पिता का नाम / पूर्वाधिकारी विशिष्ट उपलब्धि या तथ्य
श्री गुप्त
(240 - 280 ई.)
(संस्थापक) गुप्त वंश के संस्थापक, 'महाराज' की उपाधि (सामंत की स्थिति)।
घटोत्कच
(280 - 319 ई.)
श्री गुप्त का पुत्र इन्होंने भी 'महाराज' की उपाधि धारण की, ये चंद्रगुप्त प्रथम के पिता थे।
चंद्रगुप्त प्रथम
(319 - 335 ई.)
घटोत्कच गुप्त वंश के वास्तविक संस्थापक, गुप्त संवत चलाया, 'महाराजाधिराज' की उपाधि।
समुद्रगुप्त
(335 - 380 ई.)
चंद्रगुप्त प्रथम 'भारत का नेपोलियन', उत्तर और दक्षिण का महाविजय अभियान।
रामगुप्त
(380 ई.)
समुद्रगुप्त शकों से हारकर पत्नी ध्रुवस्वामिनी को सौंपने को तैयार था।
चंद्रगुप्त द्वितीय (विक्रमादित्य)
(380 - 415 ई.)
समुद्रगुप्त (रामगुप्त को मारा) शकों का पूर्ण नाश, कालिदास आदि नवरत्न इनके दरबार में थे।
कुमारगुप्त प्रथम
(415 - 455 ई.)
चंद्रगुप्त द्वितीय नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना।
स्कंदगुप्त
(455 - 467 ई.)
कुमारगुप्त प्रथम हूणों के भयंकर आक्रमण से भारत को बचाया।
विष्णुगुप्त
(540 - 550 ई.)
गुप्त वंश के अंतिम शासक हूणों और सामंतों के विद्रोह से साम्राज्य का पतन।

12. पल्लव वंश (275 ई. - 897 ई.) | शासन स्थान: कांचीपुरम (तमिलनाडु)

शासक का नाम व समय पिता का नाम / पूर्वाधिकारी विशिष्ट उपलब्धि या तथ्य
सिंहविष्णु
(575 - 600 ई.)
पल्लव वंश का उत्कर्ष दक्षिण में कला और साहित्य को बढ़ावा।
महेंद्रवर्मन प्रथम
(600 - 630 ई.)
सिंहविष्णु 'मत्तविलास प्रहसन' लिखा, चट्टान काटकर मंदिर बनवाए।
नरसिंहवर्मन प्रथम
(630 - 668 ई.)
महेंद्रवर्मन प्रथम चालुक्य राजा पुलकेशिन द्वितीय को हराया, महाबलीपुरम के रथ मंदिर बनाए।

13. पुष्यभूति (वर्द्धन) वंश (580 ई. - 647 ई.) | शासन स्थान: थानेश्वर (हरियाणा) और कन्नौज

शासक का नाम व समय पिता का नाम / पूर्वाधिकारी विशिष्ट उपलब्धि या तथ्य
प्रभाकरवर्धन
(580 - 605 ई.)
गुप्तों के पतन के बाद उदय हूणों को खदेड़ा।
राज्यवर्धन
(605 - 606 ई.)
प्रभाकरवर्धन गौड़ नरेश शशांक ने धोखे से इसकी हत्या की।
हर्षवर्धन
(606 - 647 ई.)
प्रभाकरवर्धन (राज्यवर्धन का भाई) उत्तर भारत को एक किया। बिना उत्तराधिकारी के मृत्यु हुई।

14. पाल वंश (750 ई. - 1174 ई.) | शासन स्थान: मुंगेर और बंगाल

शासक का नाम व समय पिता का नाम / पूर्वाधिकारी विशिष्ट उपलब्धि या तथ्य
गोपाल
(750 - 770 ई.)
(जनता द्वारा चुना गया) ओदंतपुरी महाविहार बनवाया।
धर्मपाल
(770 - 810 ई.)
गोपाल विक्रमशिला विश्वविद्यालय और सोमपुर महाविहार बनवाया। त्रिपक्षीय संघर्ष में भाग लिया।
देवपाल
(810 - 850 ई.)
धर्मपाल का पुत्र पाल साम्राज्य का सर्वाधिक विस्तार किया। दक्षिण-पूर्व एशिया (शैलेंद्र वंश) के शासक को नालंदा में विहार बनाने के लिए 5 गाँव दान दिए।
महीपाल प्रथम
(988 - 1038 ई.)
विग्रहपाल द्वितीय का पुत्र पाल वंश का 'द्वितीय संस्थापक' कहा जाता है। इसने वंश की खोई हुई शक्ति को पुनर्जीवित किया और चोल शासक राजेंद्र चोल के आक्रमण का सामना किया।
रामपाल
(1077 - 1120 ई.)
शूरपाल द्वितीय का उत्तराधिकारी पाल वंश का अंतिम प्रतापी शासक। 'कैवर्त विद्रोह' का सफलतापूर्वक दमन किया। इन्हीं के शासनकाल में सन्ध्याकर नन्दी ने 'रामचरितम्' की रचना की।

15. गुर्जर-प्रतिहार वंश (730 ई. - 1036 ई.) | शासन स्थान: कन्नौज, गुजरात, राजस्थान

शासक का नाम व समय पिता का नाम / पूर्वाधिकारी विशिष्ट उपलब्धि या तथ्य
नागभट्ट प्रथम
(730 - 760 ई.)
(वास्तविक संस्थापक) अरबों (जुन्नैद) को भारत में घुसने से रोका और साम्राज्य की नींव रखी।
कक्कुत्स्थ और देवराज
(760 - 780 ई.)
नागभट्ट प्रथम के भतीजे ये दोनों भाई थे जिन्होंने 20 वर्षों तक शासन किया। देवराज ही वत्सराज के पिता थे।
वत्सराज
(780 - 805 ई.)
देवराज का पुत्र कन्नौज के लिए 'त्रिपक्षीय संघर्ष' (पाल, राष्ट्रकूट और प्रतिहार के बीच) की शुरुआत की।
नागभट्ट द्वितीय
(805 - 833 ई.)
वत्सराज का पुत्र कन्नौज पर पूर्ण अधिकार कर उसे अपनी राजधानी बनाया।
रामभद्र
(833 - 836 ई.)
नागभट्ट द्वितीय का पुत्र एक कमज़ोर शासक, जिसके समय में साम्राज्य को कुछ नुकसान हुआ।
मिहिर भोज (भोज प्रथम)
(836 - 885 ई.)
रामभद्र का पुत्र 'आदिवराह' और 'प्रभास' की उपाधि, इस वंश का सबसे महान और प्रतापी शासक।

16. परमार वंश (800 ई. - 1305 ई.) | शासन स्थान: धार और मालवा (मध्य प्रदेश)

शासक का नाम व समय पिता का नाम / पूर्वाधिकारी विशिष्ट उपलब्धि या तथ्य
उपेंद्र (कृष्णराज)
(लगभग 800 - 818 ई.)
(संस्थापक) राष्ट्रकूटों के सामंत के रूप में मालवा में परमार वंश की प्रारंभिक नींव रखी।
मध्यवर्ती शासक (818 - 948 ई.) उपेंद्र के उत्तराधिकारी वैरीसिंह प्रथम, सियक प्रथम, वाक्पति प्रथम और वैरीसिंह द्वितीय। ये सभी राष्ट्रकूटों के अधीन सामंत ही बने रहे।
सियक द्वितीय (हर्ष)
(948 - 972 ई.)
वैरीसिंह द्वितीय का पुत्र राष्ट्रकूटों (खोट्टिग) को हराकर मालवा में परमारों की पूर्ण रूप से स्वतंत्र सत्ता स्थापित की।
वाक्पति मुंज
(972 - 990 ई.)
सियक द्वितीय का (दत्तक) पुत्र महान कवि और विद्वानों का आश्रयदाता। धार में 'मुंज सागर' झील बनवाई।
सिंधुराज
(990 - 1010 ई.)
वाक्पति मुंज का भाई मुंज की मृत्यु के बाद सत्ता संभाली। दरबारी कवि पद्मगुप्त ने 'नवसाहसांकचरित' की रचना की।
राजा भोज
(1010 - 1055 ई.)
सिंधुराज का पुत्र 'सरस्वती कंठाभरण' जैसी कई पुस्तकें लिखीं। धार नगरी और भोजपुर शिव मंदिर बनवाया।

17. चालुक्य वंश (कल्याणी) (973 ई. - 1189 ई.) | शासन स्थान: कल्याणी (कर्नाटक)

शासक का नाम व समय पिता का नाम / पूर्वाधिकारी विशिष्ट उपलब्धि या तथ्य
तैलप द्वितीय
(973 - 997 ई.)
(संस्थापक) राष्ट्रकूटों (कर्क द्वितीय) का अंत कर कल्याणी के चालुक्य वंश की स्थापना की।
सत्याश्रय
(997 - 1008 ई.)
तैलप द्वितीय का पुत्र इन्हें महान चोल शासक राजराज प्रथम के भयंकर आक्रमण का सामना करना पड़ा था।
विक्रमादित्य पंचम और अय्यण
(1008 - 1015 ई.)
सत्याश्रय के भतीजे इन दोनों भाइयों का शासनकाल बहुत ही संक्षिप्त और शांतिपूर्ण रहा।
जयसिंह द्वितीय
(1015 - 1043 ई.)
विक्रमादित्य पंचम का भाई परमार शासक भोज और महान चोल शासक राजेंद्र प्रथम से इनका लंबा संघर्ष चला।
सोमेश्वर प्रथम
(1043 - 1068 ई.)
जयसिंह द्वितीय का पुत्र राजधानी को मान्यखेत से हटाकर 'कल्याणी' स्थानांतरित किया। कोप्पम के युद्ध में चोलों से लड़े।
सोमेश्वर द्वितीय
(1068 - 1076 ई.)
सोमेश्वर प्रथम का पुत्र एक अलोकप्रिय शासक, जिसे उसके ही छोटे भाई विक्रमादित्य षष्ठ ने गद्दी से हटाकर बंदी बना लिया।
विक्रमादित्य षष्ठ (VI)
(1076 - 1126 ई.)
सोमेश्वर प्रथम का पुत्र 'चालुक्य विक्रम संवत' चलाया। विज्ञानेश्वर (मिताक्षरा के लेखक) और बिल्हण इनके दरबार में थे।

18. शाही चोल वंश (850 ई. - 1279 ई.) | शासन स्थान: तंजौर (तमिलनाडु)

शासक का नाम व समय पिता का नाम / पूर्वाधिकारी विशिष्ट उपलब्धि या तथ्य
विजयालय
(850 - 871 ई.)
(संस्थापक) पल्लवों के सामंत उरैयूर से सत्ता आरंभ कर तंजावुर (तंजौर) पर अधिकार किया और शाही चोल वंश की स्थापना की।
आदित्य प्रथम
(871 - 907 ई.)
विजयालय का पुत्र पल्लव शासक अपराजित को हराकर पल्लव साम्राज्य का अंत किया और पूर्ण रूप से स्वतंत्र चोल सत्ता बनाई।
परान्तक प्रथम
(907 - 955 ई.)
आदित्य प्रथम का पुत्र पांड्यों को हराकर 'मदुरैकोंड' की उपाधि ली। तक्कोलम के युद्ध (949 ई.) में राष्ट्रकूट शासक कृष्ण तृतीय से इन्हें हार का सामना करना पड़ा।
मध्यवर्ती शासक (गंडरादित्य, अरिंजय,
परान्तक द्वितीय व उत्तम चोल)
(955 - 985 ई.)
परान्तक प्रथम के उत्तराधिकारी इस काल में राष्ट्रकूटों के प्रभाव के कारण चोल साम्राज्य कमज़ोर रहा। परान्तक द्वितीय (राजराज प्रथम के पिता) ने खोई हुई शक्ति को वापस पाने का प्रयास किया।
राजराज प्रथम
(985 - 1014 ई.)
परान्तक द्वितीय (सुंदर चोल) का पुत्र चोल नौसेना का बेहतरीन विकास किया, श्रीलंका के उत्तरी भाग को जीता, और तंजौर का प्रसिद्ध 'बृहदेश्वर (राजराजेश्वर) मंदिर' बनवाया।
राजेंद्र प्रथम
(1014 - 1044 ई.)
राजराज प्रथम का पुत्र गंगा घाटी तक सफल अभियान कर 'गंगईकोंडचोलपुरम' नगर बसाया। चोल नौसेना के बल पर दक्षिण-पूर्व एशिया (श्रीविजय/इंडोनेशिया) को जीता।

19. चौहान वंश (700 ई. - 1192 ई.) | शासन स्थान: अजमेर और दिल्ली

शासक का नाम व समय पिता का नाम / पूर्वाधिकारी विशिष्ट उपलब्धि या तथ्य
वासुदेव
(लगभग 551 ई.)
(संस्थापक) शाकंभरी (सांभर) में चौहान वंश की प्रारंभिक नींव रखी।
प्रारंभिक मध्यवर्ती शासक
(7वीं शताब्दी - 1090 ई.)
वासुदेव के वंशज गूवक, चंदनराज और वाक्पतिराज जैसे कई शासक हुए। प्रारंभ में ये प्रतिहारों के सामंत थे।
पृथ्वीराज प्रथम
(1090 - 1110 ई.)
विग्रहराज तृतीय का पुत्र पुष्कर में 700 चालुक्यों को हराकर ब्राह्मणों की रक्षा की। 'परमभट्टारक महाराजाधिराज' की उपाधि ली।
अजयराज द्वितीय
(1110 - 1135 ई.)
पृथ्वीराज प्रथम का पुत्र 'अजयमेरु' (अजमेर) नगर बसाया और उसे अपनी नई राजधानी बनाया।
अर्णोराज (आना जी)
(1135 - 1150 ई.)
अजयराज द्वितीय का पुत्र अजमेर में प्रसिद्ध 'आनासागर झील' का निर्माण करवाया और तुर्कों के आक्रमण को विफल किया।
जगद्देव
(1150 - 1153 ई.)
अर्णोराज का पुत्र अपने पिता अर्णोराज की हत्या कर गद्दी पर बैठा (इसे चौहानों का 'पितृहंता' कहा जाता है)।
विग्रहराज चतुर्थ (बीसलदेव)
(1153 - 1163 ई.)
अर्णोराज का पुत्र तोमरों से दिल्ली छीनी। 'हरिकेलि' नाटक लिखा। इनका समय चौहान साम्राज्य का 'स्वर्ण काल' माना जाता है।
अपरगांगेय, पृथ्वीराज द्वितीय
और सोमेश्वर

(1163 - 1178 ई.)
विग्रहराज के उत्तराधिकारी अल्पकालिक संघर्ष के बाद सोमेश्वर ने सत्ता संभाली। सोमेश्वर ही पृथ्वीराज तृतीय के पिता थे।
पृथ्वीराज तृतीय (चौहान)
(1178 - 1192 ई.)
सोमेश्वर का पुत्र तराइन के प्रथम युद्ध (1191) में मुहम्मद गोरी को हराया। दूसरे युद्ध में हार के बाद दिल्ली तुर्कों के हाथ गई, इसी युद्ध में कन्नौज के राजा जयचंद ने गद्दारी की थी।

20. अहोम वंश (1228 ई. - 1838 ई.) | शासन स्थान: ब्रह्मपुत्र घाटी और शिवसागर (असम)

पूर्वोत्तर भारत का यह वह अजेय राजवंश है जिसने मुगलों के 17 आक्रमणों को विफल किया और लगभग 600 वर्षों तक असम पर निर्बाध शासन किया। अहोम राजाओं को 'स्वर्गदेव' कहा जाता था।

शासक का नाम व समय पिता का नाम / पूर्वाधिकारी विशिष्ट उपलब्धि या तथ्य
चाओलुंग सुकफा
(1228 - 1268 ई.)
(म्यांमार/यूनान से आए
ताई राजकुमार)
अहोम साम्राज्य के संस्थापक। चराइदेओ को पहली राजधानी बनाया और स्थानीय जनजातियों के साथ समन्वय स्थापित किया।
सुहुंगमुंग (दिहिंगिया राजा)
(1497 - 1539 ई.)
सुपेनफा अहोम राज्य का अत्यधिक विस्तार किया। हिंदू धर्म से प्रभावित होकर 'स्वर्गानारायण' की उपाधि धारण करने वाले पहले अहोम शासक।
प्रताप सिंह (सुसेंगफा)
(1603 - 1641 ई.)
सुखामफा अनिवार्य सैन्य सेवा वाली 'पाइक प्रणाली' (Paik System) लागू की। प्रशासन के लिए 'बड़फुकन' और 'बड़बरुआ' के पद बनाए। मुगलों से कड़ा संघर्ष किया।
चक्रध्वज सिंह और उदयादित्य सिंह
(1663 - 1672 ई.)
जयध्वज सिंह के उत्तराधिकारी मुगलों की अधीनता अस्वीकार की। इन्हीं के काल में वीर सेनापति लाचित बड़फुकन ने सरायघाट के ऐतिहासिक युद्ध (1671) में मुगलों को ब्रह्मपुत्र नदी में बुरी तरह हराया था।
रुद्र सिंह (सुखरुंगफा)
(1696 - 1714 ई.)
गदाधर सिंह इनका काल अहोम साम्राज्य का 'स्वर्ण युग' माना जाता है। कछारी और जयंतिया राज्यों को जीता। नई राजधानी 'रंगपुर' बसाई।
राजेश्वर सिंह (सुरमफा)
(1751 - 1769 ई.)
प्रमत्त सिंह वास्तुकला का चरम विकास। प्रसिद्ध 'तलातल घर' (Talatal Ghar) और 'कारेंग घर' का निर्माण कराया।
गौरीनाथ सिंह (सुहितपंगफा)
(1780 - 1795 ई.)
लक्ष्मी सिंह इनके समय 'मोआमरिया विद्रोह' चरम पर था, जिससे राज्य अंदर से कमजोर हो गया। राजधानी को जोरहाट ले गए।
पुरंदर सिंह
(1818 - 1819 और 1833 - 1838 ई.)
चंद्रनाथ सिंह अहोम वंश के अंतिम शासक। बर्मियों (Burmese) के भयंकर आक्रमणों और 1826 की 'यांडाबू की संधि' के बाद अंग्रेजों ने असम पर कब्ज़ा कर लिया और 1838 में इन्हें गद्दी से हटा दिया।

21. दिल्ली सल्तनत (1206 ई. - 1526 ई.) | शासन स्थान: दिल्ली

शासक का नाम व समय पिता का नाम / पूर्वाधिकारी विशिष्ट उपलब्धि या तथ्य
कुतुबुद्दीन ऐबक
(1206 - 1210 ई.)
मुहम्मद गोरी का गुलाम दिल्ली सल्तनत का संस्थापक। 'लाख बख्श' की उपाधि और कुतुब मीनार की नींव रखी।
इल्तुतमिश
(1211 - 1236 ई.)
ऐबक का दामाद दिल्ली सल्तनत का 'वास्तविक संस्थापक'। 'चालीसा दल' (तुर्क-ए-चहलगानी) बनाया और इक्ता प्रणाली शुरू की।
रज़िया सुल्तान
(1236 - 1240 ई.)
इल्तुतमिश की पुत्री दिल्ली की पहली और अंतिम महिला मुस्लिम शासिका।
गयासुद्दीन बलबन
(1266 - 1287 ई.)
इल्तुतमिश का गुलाम 'लौह एवं रक्त' की नीति अपनाई। सिजदा और पाबोस प्रथा शुरू की और चालीसा दल को खत्म किया।
जलालुद्दीन खिलजी
(1290 - 1296 ई.)
(संस्थापक) खिलजी वंश की स्थापना की। यह एक उदार शासक था।
अलाउद्दीन खिलजी
(1296 - 1316 ई.)
जलालुद्दीन का भतीजा/दामाद बाजार नियंत्रण (मूल्य नियंत्रण) प्रणाली, दाग और हुलिया प्रथा। दक्षिण भारत को जीतने वाला पहला सुल्तान।
गयासुद्दीन तुगलक
(1320 - 1325 ई.)
(संस्थापक) तुगलक वंश की स्थापना। सिंचाई के लिए नहरें बनवाने वाला पहला सुल्तान।
मुहम्मद बिन तुगलक
(1325 - 1351 ई.)
गयासुद्दीन का पुत्र राजधानी दिल्ली से देवगिरी (दौलताबाद) बदली। सांकेतिक मुद्रा (Token Currency) चलाई।
फिरोज शाह तुगलक
(1351 - 1388 ई.)
म. बिन तुगलक का चचेरा भाई जजिया कर को ब्राह्मणों पर भी लगाया। हिसार, फिरोजाबाद और जौनपुर जैसे नए शहर बसाए।
बहलोल लोदी
(1451 - 1489 ई.)
(संस्थापक) दिल्ली पर पहले अफगान वंश (लोदी वंश) की स्थापना की।
सिकंदर लोदी
(1489 - 1517 ई.)
बहलोल लोदी का पुत्र 1504 ई. में आगरा शहर बसाया। 'गज-ए-सिकंदरी' (भूमि माप की इकाई) शुरू की।
इब्राहिम लोदी
(1517 - 1526 ई.)
सिकंदर लोदी का पुत्र पानीपत के प्रथम युद्ध (1526) में बाबर से हारकर मारा गया। सल्तनत काल का अंतिम सुल्तान।

22. विजयनगर साम्राज्य (1336 ई. - 1646 ई.) | शासन स्थान: हम्पी (कर्नाटक) और दक्षिण भारत

शासक का नाम व समय पिता का नाम / पूर्वाधिकारी विशिष्ट उपलब्धि या तथ्य
हरिहर प्रथम और बुक्का प्रथम
(1336 - 1377 ई.)
संगम के पुत्र विजयनगर साम्राज्य की स्थापना। हम्पी को राजधानी बनाया और दक्षिण में हिंदू संस्कृति की रक्षा की।
हरिहर द्वितीय और देवराय प्रथम
(1377 - 1422 ई.)
बुक्का प्रथम के उत्तराधिकारी हरिहर द्वितीय ने 'महाराजाधिराज' की उपाधि ली। देवराय प्रथम ने तुंगभद्रा नदी पर बाँध बनवाया।
देवराय द्वितीय
(1422 - 1446 ई.)
वीर विजय बुक्का के पुत्र संगम वंश का सबसे प्रतापी शासक। 'गजबेटकर' (हाथियों का शिकारी) और 'इम्माडि देवराय' कहलाए।
मल्लिकार्जुन व विरूपाक्ष द्वितीय
(1446 - 1485 ई.)
देवराय द्वितीय के उत्तराधिकारी संगम वंश के अंतिम और कमज़ोर शासक। इन्हीं के समय साम्राज्य का पतन शुरू हुआ।
सालुव नरसिंह
(1485 - 1491 ई.)
(संस्थापक) 'प्रथम बलापहार' (सत्ता परिवर्तन) कर सालुव वंश की स्थापना की और राज्य को बिखरने से बचाया।
वीर नरसिंह तुलुव
(1505 - 1509 ई.)
नरसा नायक के पुत्र 'द्वितीय बलापहार' द्वारा तुलुव वंश की स्थापना की।
कृष्णदेव राय
(1509 - 1529 ई.)
वीर नरसिंह के भाई साम्राज्य का स्वर्ण काल। 'अमुक्तमाल्यद' ग्रंथ लिखा। अष्टदिग्गज (तेनाली रामा आदि) इनके दरबार में थे।
अच्युत देव राय और
सदाशिव राय

(1529 - 1565 ई.)
कृष्णदेव राय के उत्तराधिकारी सदाशिव राय के समय वास्तविक सत्ता मंत्री 'आलिया राम राय' के हाथ में थी।
आलिया राम राय
(1542 - 1565 ई.)
सदाशिव राय के मंत्री 1565 के 'तालीकोटा युद्ध' (राक्षस-तांगड़ी) में दक्कन सुल्तानों के संघ से हार और मृत्यु। हम्पी का विनाश।
तिरुमल और उत्तराधिकारी
(1570 - 1646 ई.)
राम राय का भाई पेनुकोंडा में अराविडू वंश की स्थापना की। साम्राज्य धीरे-धीरे सिमटकर अंततः समाप्त हो गया।

23. ओडिशा (कलिंग) का सम्पूर्ण ऐतिहासिक कालक्रम: प्राचीन से मध्यकाल तक

शासक का नाम व समय पिता / पूर्व राजा विशिष्ट तथ्य एवं ऐतिहासिक वीरता
अनंत पद्मनाभन (संभावित)
(261 ई.पू.)
स्थानीय कलिंग शासक मौर्य सम्राट अशोक के विरुद्ध भीषण 'कलिंग युद्ध' लड़ा। इस युद्ध के नरसंहार के बाद ही अशोक ने 'धम्म' का मार्ग अपनाया था।
महामेघवाहन
(प्रथम शताब्दी ई.पू.)
मौर्यों के पतन के बाद कलिंग में स्वतंत्र चेदि/महामेघवाहन वंश की स्थापना की और मगध की अधीनता को पूरी तरह समाप्त किया।
वृद्धराज / चेतराज महामेघवाहन (वंशज) ये सम्राट खारवेल के पिता थे। इन्होंने कलिंग की सैन्य शक्ति को संगठित किया जिसका उपयोग आगे चलकर खारवेल ने किया।
सम्राट खारवेल
(193 - 170 ई.पू. लगभग)
चेतराज (पिता) कलिंग के सबसे प्रतापी राजा। मगध से 'कलिंग जिन' की मूर्ति वापस लाए। हाथीगुम्फा अभिलेख इन्हीं का है। इन्होंने सातवाहन और पांड्य राजाओं को हराया।
कुदेपसिरी (वक्रदेव) सम्राट खारवेल (पुत्र) खारवेल के उत्तराधिकारी। इन्होंने उदयगिरि में मंचपुरी गुफा का निर्माण करवाया और जैन धर्म को संरक्षण दिया।
वडुख कुदेपसिरी (पुत्र) खारवेल के पौत्र। अभिलेखों के अनुसार इनके समय तक कलिंग एक समृद्ध और शक्तिशाली साम्राज्य बना रहा।
कपिलेंद्र देव
(1434–1466 ई.)
सूर्यवंशी (संस्थापक) गजपति राजवंश के संस्थापक। इनका साम्राज्य गंगा से कावेरी तक फैला था। इन्हें 'हाथियों का स्वामी' कहा जाता था।
पुरुषोत्तम देव
(1466–1497 ई.)
कपिलेंद्र देव (पिता) इन्होंने कांची विजय की और दक्षिण भारत में ओडिशा का प्रभाव बढ़ाया। ये भगवान जगन्नाथ के अनन्य भक्त थे।
प्रतापरुद्र देव (रुद्रदेव)
(1497–1540 ई.)
पुरुषोत्तम देव (पिता) इनके समय चैतन्य महाप्रभु ओडिशा आए। विजयनगर सम्राट कृष्णदेवराय के साथ इनका प्रसिद्ध संघर्ष हुआ और अंततः संधि हुई।

विजयनगर सम्राट कृष्णदेवराय और ओडिशा के गजपति शासक प्रतापरुद्र देव के बीच 1512 से 1519 ईस्वी के दौरान एक भीषण ऐतिहासिक संघर्ष हुआ, जिसका मुख्य कारण उदयगिरि और कोंडाविडु जैसे रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण किलों पर अधिकार और वर्चस्व की लड़ाई थी। कृष्णदेवराय ने एक के बाद एक पांच सफल सैन्य अभियानों में गजपति सेना को परास्त कर उनके प्रमुख दुर्गों को जीत लिया और उनकी राजधानी कटक तक सैन्य दबाव बना दिया। अंततः, अपनी शक्ति क्षीण होते देख प्रतापरुद्र देव को संधि करनी पड़ी, जिसके तहत कृष्णा नदी को दोनों साम्राज्यों के बीच की सीमा रेखा मान लिया गया और शांति स्थापित करने हेतु गजपति ने अपनी पुत्री राजकुमारी जगन्मोहिनी का विवाह सम्राट कृष्णदेवराय से कर दिया। इस गौरवशाली विजय ने कृष्णदेवराय को दक्षिण भारत का निर्विवाद महाशक्तिशाली सम्राट बना दिया।

24. मैसूर रियासत - वाडेयार (Wadiyar) राजवंश (1399 ई. - 1950 ई.) | शासन स्थान: मैसूर (कर्नाटक)

दक्षिण भारत का एक अत्यंत दीर्घकालिक राजवंश, जिसने विजयनगर के सामंतों से लेकर स्वतंत्र सत्ता, हैदर अली/टीपू सुल्तान के काल का व्यवधान और फिर ब्रिटिश काल में भारत की सबसे आधुनिक रियासत बनने तक का सफर तय किया।

शासक का नाम व समय पिता का नाम / पूर्वाधिकारी विशिष्ट उपलब्धि या तथ्य
यदुराय वाडेयार
(1399 - 1423 ई.)
(संस्थापक) विजयनगर के सामंत मैसूर में वाडेयार राजवंश की नींव रखी और विजयनगर साम्राज्य के प्रति निष्ठावान रहे।
प्रारंभिक शासक
(1423 - 1578 ई.)
यदुराय के उत्तराधिकारी चामराज प्रथम से चामराज चतुर्थ तक के शासक। इस दौरान मैसूर एक छोटा सामंती राज्य बना रहा।
राजा वाडेयार प्रथम
(1578 - 1617 ई.)
चामराज वाडेयार चतुर्थ श्रीरंगपट्टनम पर विजय प्राप्त की और विजयनगर के पतन के बाद राज्य का विस्तार किया। प्रसिद्ध मैसूर दशहरा की शुरुआत की।
कंठीरव नरसराज प्रथम
(1638 - 1659 ई.)
राजा वाडेयार के वंशज अपनी मुद्रा (कंठीरय पणम) जारी करने वाले पहले वाडेयार राजा। इन्होंने मैसूर की सैन्य शक्ति को सुदृढ़ किया।
चिक्का देवराज
(1673 - 1704 ई.)
डोड्डा देवराज के पुत्र प्रशासनिक सुधार (अठारह कचहरी) लागू किए। मराठों और मुगलों के साथ कूटनीतिक संबंध बनाकर राज्य को सुरक्षित रखा।
कमज़ोर शासक और दलवई शासन
(1704 - 1761 ई.)
चिक्का देवराज के उत्तराधिकारी कृष्णराज वाडेयार प्रथम और द्वितीय के समय सत्ता मंत्रियों (दलवई) के हाथ में चली गई, जिससे हैदर अली के उत्थान का मार्ग प्रशस्त हुआ।
हैदर अली और टीपू सुल्तान का काल
(1761 - 1799 ई.)
(सैन्य शासन) हैदर अली ने सत्ता पर नियंत्रण किया। टीपू सुल्तान ने अंग्रेजों के विरुद्ध चार आंग्ल-मैसूर युद्ध लड़े। 1799 के युद्ध में टीपू सुल्तान के अंत के साथ इस काल का अंत हुआ।
कृष्णराज वाडेयार तृतीय
(1799 - 1868 ई.)
चामराज वाडेयार के पुत्र अंग्रेजों के साथ सहायक संधि (Subsidiary Alliance) के तहत वाडेयार वंश की पुनर्स्थापना हुई। इन्होंने कला और साहित्य को संरक्षण दिया।
चामराजेंद्र वाडेयार दसवें
(1881 - 1894 ई.)
कृष्णराज तृतीय के दत्तक पुत्र 1831-81 के प्रत्यक्ष ब्रिटिश शासन के बाद सत्ता वापस मिली (Rendition)। इनके काल में प्रतिनिधि सभा (Representative Assembly) की शुरुआत हुई।
कृष्णराज वाडेयार चतुर्थ
(1894 - 1940 ई.)
चामराज वाडेयार दसवें के पुत्र इन्हें आधुनिक मैसूर का निर्माता माना जाता है। शिक्षा, जलविद्युत और औद्योगिकीकरण में कीर्तिमान स्थापित किए।
जयचामराजेंद्र वाडेयार
(1940 - 1950 ई.)
कृष्णराज चतुर्थ के भतीजे वंश के अंतिम शासक। भारत की स्वतंत्रता के बाद 1947 में अपनी रियासत का भारत संघ में विलय किया।

25. हैदराबाद रियासत - आसफ जाही (निज़ाम) वंश (1724 ई. - 1948 ई.) | शासन स्थान: हैदराबाद (दक्कन)

मुगलों के पतन के बाद दक्षिण भारत में सबसे बड़ी इस्लामी रियासत की स्थापना हुई। इसके शासक 'निज़ाम' कहलाते थे।

शासक का नाम व समय पिता का नाम / पूर्वाधिकारी विशिष्ट उपलब्धि या तथ्य
मीर क़मर-उद-दीन खान (निज़ाम-उल-मुल्क, आसफ जाह प्रथम)
(1724 - 1748 ई.)
गाजी-उद-दीन खान फिरोज जंग मुगल साम्राज्य के वजीर थे। मुगलों से अलग होकर हैदराबाद के स्वतंत्र आसफ जाही वंश की स्थापना की।
निज़ाम अली खान (आसफ जाह द्वितीय)
(1762 - 1803 ई.)
आसफ जाह प्रथम अंग्रेजों के साथ 1798 में 'सहायक संधि' (Subsidiary Alliance) पर हस्ताक्षर करने वाले भारत के पहले शासक बने।
मीर महबूब अली खान (आसफ जाह षष्ठम/VI)
(1869 - 1911 ई.)
अफज़ल-उद-दौला हैदराबाद में रेलवे लाइन बिछवाई और सती प्रथा जैसी कुप्रथाओं को समाप्त करने के प्रयास किए।
मीर उस्मान अली खान (आसफ जाह सप्तम/VII)
(1911 - 1948 ई.)
मीर महबूब अली खान हैदराबाद के अंतिम निज़ाम। अपने समय में दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति थे। उस्मानिया विश्वविद्यालय की स्थापना की। 1948 में भारतीय सेना के 'ऑपरेशन पोलो' के बाद हैदराबाद भारत में मिला लिया गया।

26. मेवाड़ साम्राज्य - गुहिल और सिसोदिया वंश (734 ई. - 1948 ई.) | शासन स्थान: चित्तौड़गढ़ और उदयपुर

शासक का नाम व समय पिता का नाम / पूर्वाधिकारी विशिष्ट उपलब्धि या तथ्य
बप्पा रावल (कालभोज)
(734 - 753 ई.)
गुहादित्य के वंशज मेवाड़ के वास्तविक संस्थापक। चित्तौड़गढ़ जीता और अरबों को गजनी तक खदेड़ा। 'एकलिंग जी' मंदिर का निर्माण कराया।
मध्यवर्ती गुहिल शासक
(753 - 951 ई.)
बप्पा रावल के वंशज खुमान प्रथम, मत्तट और भर्तृपट्ट जैसे शासक हुए जिन्होंने प्रतिहारों के साथ मिलकर राष्ट्र की रक्षा की।
अल्लट (आलू रावल)
(951 - 971 ई.)
भर्तृपट्ट द्वितीय आहड़ को दूसरी राजधानी बनाया। हूण राजकुमारी हरिया देवी से विवाह किया और मेवाड़ में प्रथम नौकरशाही स्थापित की।
शति कुमार से विजय सिंह
(971 - 1213 ई.)
अल्लट के वंशज इस काल में मालवा के परमारों और गुजरात के चालुक्यों से संघर्ष रहा। शक्ति कुमार के समय मुंज परमार ने चित्तौड़ पर अधिकार किया था।
रावल जैत्र सिंह
(1213 - 1253 ई.)
पदम सिंह 'भूताला के युद्ध' में दिल्ली के सुल्तान इल्तुतमिश को बुरी तरह हराया। चित्तौड़ को नई राजधानी बनाया।
रावल तेज सिंह और समर सिंह
(1253 - 1302 ई.)
जैत्र सिंह के वंशज तेज सिंह के समय मेवाड़ का प्रथम चित्रित ग्रंथ 'श्रावक प्रतिक्रमण सूत्र चूर्णी' लिखा गया। समर सिंह ने अलाउद्दीन से कर वसूला था।
रावल रतन सिंह
(1302 - 1303 ई.)
समर सिंह के पुत्र 1303 में अलाउद्दीन खिलजी का आक्रमण। गोरा-बादल की वीरता और रानी पद्मिनी का जौहर। रावल शाखा का यहाँ अंत हुआ।
राणा हम्मीर सिंह
(1326 - 1364 ई.)
अरि सिंह (सिसोदिया ग्राम) सिसोदिया शाखा की स्थापना। चित्तौड़ को वापस जीता। 'मेवाड़ का उद्धारक' और 'विषम घाटी पंचानन' (युद्ध में सिंह के समान) की उपाधि।
राणा लाखा (लक्ष सिंह)
(1382 - 1421 ई.)
राणा क्षेत्र सिंह जावर में चांदी की खान निकली। पिछोला झील का निर्माण हुआ। इनके पुत्र कुंवर चूँडा ने पिता के लिए राज्य त्याग दिया (मेवाड़ के भीष्म)।
राणा मोकल
(1421 - 1433 ई.)
राणा लाखा के पुत्र हंसाबाई के पुत्र। समधेश्वर मंदिर का जीर्णोद्धार कराया। इनकी हत्या इनके ही चाचा चाचा और मेरा ने की थी।
महाराणा कुम्भा
(1433 - 1468 ई.)
राणा मोकल के पुत्र स्थापत्य कला का स्वर्ण युग। विजय स्तंभ और कुंभलगढ़ का निर्माण। मालवा और गुजरात के सुल्तानों को 'सारंगपुर युद्ध' में हराया।
महाराणा रायमल
(1473 - 1509 ई.)
महाराणा कुम्भा इनके समय इनके पुत्रों (पृथ्वीराज, जयमल और सांगा) के बीच उत्तराधिकार का संघर्ष हुआ।
महाराणा सांगा (संग्राम सिंह)
(1509 - 1528 ई.)
महाराणा रायमल खातोली और गागरोन के युद्ध जीते। 1527 में बाबर के विरुद्ध खानवा का युद्ध लड़ा। शरीर पर 80 घाव होने पर भी युद्ध लड़ा।
कुंवर भोजराज एवं मीराबाई
(1516 विवाह)
सांगा के ज्येष्ठ पुत्र मीराबाई का विवाह सांगा के पुत्र भोजराज से हुआ। भोजराज की मृत्यु के बाद मीराबाई का कृष्ण प्रेम जगप्रसिद्ध हुआ।
विक्रमादित्य एवं बनवीर
(1531 - 1540 ई.)
सांगा के पुत्र / दासी पुत्र गुजरात के शासक बहादुरशाह के आक्रमण के कारण चित्तौण का दूसरा साका (1535), रानी कर्णावती का जौहर। बनवीर के षटयंत्र से बचाने के लिए पन्ना धाय ने अपने पुत्र चंदन का बलिदान देकर उदय सिंह (द्वितीय) की रक्षा की।
महाराणा उदय सिंह द्वितीय
(1540 - 1572 ई.)
महाराणा सांगा 1559 में उदयपुर शहर बसाया। 1567 में अकबर का आक्रमण - जयमल और फत्ता की वीरता (चित्तौड़ का तीसरा साका)।
महाराणा प्रताप
(1572 - 1597 ई.)
उदय सिंह के पुत्र 1576 में हल्दीघाटी का युद्ध। मुगलों की अधीनता कभी स्वीकार नहीं की। 1582 में 'दिवेर का युद्ध' जीतकर विजय अभियान शुरू किया।
महाराणा अमर सिंह प्रथम
(1597 - 1620 ई.)
महाराणा प्रताप के पुत्र 1615 में जहाँगीर के साथ सम्मानजनक संधि की। मुगलों के दरबार में स्वयं कभी उपस्थित नहीं हुए।
महाराणा जगत सिंह - राज सिंह प्रथम
(1628 - 1680 ई.)
अमर सिंह के वंशज राज सिंह ने औरंगजेब का जजिया कर के लिए विरोध किया। राजसमंद झील बनवाई और श्रीनाथजी की मूर्ति को संरक्षण दिया।
महाराणा जय सिंह - भीम सिंह
(1680 - 1828 ई.)
राज सिंह के वंशज 1818 में महाराणा भीम सिंह के समय ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ संधि हुई। कृष्णा कुमारी विवाद इसी काल में हुआ।
महाराणा फतेह सिंह
(1884 - 1930 ई.)
शक्ति सिंह के वंशज दिल्ली दरबार जाने से मना किया। पतेह सागर झील का निर्माण। अत्यंत स्वाभिमानी शासक।
महाराणा भूपाल सिंह
(1930 - 1948 ई.)
महाराणा फतेह सिंह मेवाड़ के अंतिम शासक। भारत की आजादी के बाद रियासत का विलय किया और राजस्थान के एकमात्र 'महाराज प्रमुख' बने।

27. रणथंभौर का चौहान राजवंश (1194 - 1301 ई.)

शासक व समय पिता / पूर्वाधिकारी विशिष्ट तथ्य एवं वीरता
गोविन्दराज (1194 ई. से) पृथ्वीराज चौहान तृतीय ये मुहम्मद गोरी को हराने वाले पृथ्वीराज तृतीय के पुत्र थे। तराइन के द्वितीय युद्ध (1192) के बाद इन्होंने रणथंभौर में नई चौहान शाखा की नींव रखी।
वाग्भट्ट (1236 - 1259 ई.) वीर नारायण (चाचा) इल्तुतमिश द्वारा छीने गए दुर्ग को वापस जीता। इसी काल में प्रसिद्ध जैन विद्वान (राजा नहीं) वाग्भट्ट ने 'वाग्भट्टालंकार' और 'काव्यानुशासन' जैसे ग्रंथों की रचना की थी।
जैत्र सिंह
(1250 - 1282 ई.)
वाग्भट्ट अपने 32 वर्षों के सफल शासन की स्मृति में इनके पुत्र हम्मीर ने दुर्ग के भीतर '32 खंभों की छतरी' (न्याय की छतरी) का निर्माण करवाया था।
हम्मीर देव चौहान
(1282 - 1301 ई.)
जैत्र सिंह अलाउद्दीन खिलजी से ऐतिहासिक संघर्ष। सेनापति रणमल और रतिपाल की गद्दारी के कारण इनकी पुत्री देवलदे (पद्मला) ने पद्मला तालाब में जल जौहर किया। यह राजस्थान का प्रथम साका था। हम्मीर देव ने खुद 'शृंगार हार' ग्रंथ लिखा था।

28. मारवाड़ साम्राज्य - राठौड़ वंश (13वीं सदी - 1948 ई.) | शासन स्थान: मंडोर और जोधपुर (राजस्थान)

रेगिस्तान के वीर राठौड़ों ने अपने साम्राज्य को बहुत विशाल बनाया और मुगलों के साथ इनके संबंध कूटनीति और संघर्ष दोनों के रहे।

शासक का नाम व समय पिता का नाम / पूर्वाधिकारी विशिष्ट उपलब्धि या तथ्य
राव सीहा
(1240 - 1273 ई.)
कन्नौज के गहड़वालों के वंशज मारवाड़ में राठौड़ वंश के आदिपुरुष। पाली के ब्राह्मणों की रक्षा करते हुए 'लाखा झंवर' के युद्ध में वीरगति प्राप्त की।
राव आस्थान और राव धूहड़
(1273 - 1309 ई.)
राव सीहा के वंशज धूहड़ जी कर्नाटक से अपनी कुलदेवी चक्रेश्वरी (नागणेची माता) की मूर्ति लाए और नगाणा (बाड़मेर) में स्थापित की।
राव वीरमदेव
(1383 - 1384 ई.)
राव सलखा के पुत्र अत्यंत पराक्रमी योद्धा। इन्होंने जोहियों और तुर्कों के विरुद्ध भयंकर संघर्ष किया। इन्हीं के पदचिह्नों पर चलकर इनके पुत्र चूंडा ने साम्राज्य विस्तार किया।
राव चूंडा
(1384 - 1423 ई.)
राव वीरमदेव के पुत्र इंदा प्रतिहारों से मंडोर दहेज में प्राप्त किया। मारवाड़ में सामंती व्यवस्था (Feudal System) की शुरुआत की।
राव रणमल
(1427 - 1438 ई.)
राव चूंडा के पुत्र मेवाड़ और मारवाड़ की राजनीति के केंद्र रहे। अपनी बहन हंसाबाई का विवाह मेवाड़ के राणा लाखा से कराया। चित्तौड़ में इनकी हत्या हुई।
राव जोधा
(1438 - 1489 ई.)
राव रणमल के पुत्र 1459 में जोधपुर बसाया और चिड़ियाटूँक पहाड़ी पर मेहरानगढ़ किला बनवाया। मेवाड़ के साथ 'आँवल-बाँवल की संधि' की।
राव सातल
(1489 - 1492 ई.)
राव जोधा के पुत्र अदम्य साहसी। अजमेर के सूबेदार मल्लू खान की सेना से 140 कन्याओं को छुड़ाया। इसी स्मृति में 'घुड़ला त्योहार' मनाया जाता है। युद्ध के घावों के कारण इनकी मृत्यु हुई।
राव सूजा और राव गांगा
(1492 - 1532 ई.)
राव जोधा के वंशज गांगा जी ने खानवा के युद्ध में राणा सांगा की सहायता के लिए अपने पुत्र मालदेव के नेतृत्व में सेना भेजी थी।
राव मालदेव
(1532 - 1562 ई.)
राव गांगा के पुत्र 52 युद्धों के विजेता। 1544 के 'गिरि सुमेल युद्ध' में शेरशाह सूरी के पसीने छुड़ा दिए। इन्हें 'हिंदुस्तान का सबसे प्रतापी राजा' कहा गया।
राव चंद्रसेन
(1562 - 1581 ई.)
राव मालदेव के पुत्र 'मारवाड़ का प्रताप' और 'भूला-बिसरा राजा'। अकबर की अधीनता के विरुद्ध जंगलों में भटकना स्वीकार किया पर झुकना नहीं।
मोटा राजा उदय सिंह
(1583 - 1595 ई.)
मालदेव के पुत्र मुगलों की अधीनता स्वीकार करने वाले पहले राठौड़ शासक। अपनी पुत्री का विवाह जहाँगीर से किया।
महाराजा गज सिंह और जसवंत सिंह प्रथम
(1619 - 1678 ई.)
उदय सिंह के वंशज जसवंत सिंह प्रथम ने औरंगजेब के विरुद्ध धर्मत का युद्ध लड़ा। इनकी मृत्यु पर औरंगजेब ने कहा था—'आज कुफ्र का दरवाज़ा टूट गया।'
महाराजा अजीत सिंह (एवं वीर दुर्गादास)
(1679 - 1724 ई.)
जसवंत सिंह के पुत्र वीर दुर्गादास राठौड़ ने अजीत सिंह की रक्षा के लिए मुगलों से 30 वर्ष तक संघर्ष किया। दुर्गादास को 'मारवाड़ का अणबिंदिया मोती' कहा जाता है।
महाराजा अभय सिंह
(1724 - 1749 ई.)
अजीत सिंह के पुत्र इनके काल में 1730 में प्रसिद्ध 'खेजड़ली बलिदान'
(अमृता देवी बिश्नोई के नेतृत्व में) हुआ था।
महाराजा मान सिंह
(1803 - 1843 ई.)
विजयपुर सिंह के वंशज 'संन्यासी राजा'। नाथ संप्रदाय के अनुयायी। 1818 में अंग्रेजों के साथ सहायक संधि की। जोधपुर में 'महामंदिर' बनवाया।
महाराजा उम्मेद सिंह
(1918 - 1947 ई.)
सुमेर सिंह के भाई आधुनिक जोधपुर के निर्माता। विश्व का सबसे बड़ा रिहायशी महल 'उम्मेद भवन' बनवाया। अकाल राहत कार्यों के लिए प्रसिद्ध।
महाराजा हनवंत सिंह
(1947 - 1952 ई.)
उम्मेद सिंह के पुत्र मारवाड़ के अंतिम शासक। स्वतंत्रता के समय भारत संघ में विलय के पत्र पर हस्ताक्षर किए।

29. कछवाहा राजवंश (आमेर/जयपुर रियासत) (11वीं सदी - 1949 ई.) | शासन स्थान: आमेर और जयपुर (राजस्थान)

राजपूतों का यह वंश अपनी कूटनीति, मुगलों के साथ मजबूत सैन्य व वैवाहिक संबंधों और वास्तुकला (जयपुर शहर) के लिए प्रसिद्ध रहा।

शासक का नाम व समय पिता का नाम / पूर्वाधिकारी विशिष्ट उपलब्धि या तथ्य
दूल्हे राय (तेजकरण)
(1137 - 1170 ई.)
(ग्वालियर के नरवर से आए) दौसा और रामगढ़ को जीतकर ढूंढाड़ में कछवाहा वंश की नींव रखी।
काकिल देव
(1170 - 1194 ई.)
दूल्हे राय के पुत्र मीणाओं को हराकर आमेर जीता और उसे कछवाहा वंश की नई राजधानी बनाया।
पजवन देव
(12वीं सदी के उत्तरार्ध)
काकिल देव के वंशज पृथ्वीराज चौहान के प्रमुख सेनापति और साले थे। इन्होंने कई युद्धों में वीरता दिखाई।
पृथ्वीराज सिंह प्रथम
(1503 - 1527 ई.)
चंद्रसेन के पुत्र राणा सांगा के साथ खानवा के युद्ध (1527) में भाग लिया। इन्होंने आमेर को 12 'कोटड़ियों' (प्रशासनिक इकाइयों) में बाँटा।
राजा भारमल
(1547 - 1573 ई.)
पृथ्वीराज सिंह के पुत्र मुगलों (अकबर) के साथ वैवाहिक संबंध स्थापित करने वाले पहले राजपूत शासक। अपनी पुत्री हरखा बाई का विवाह किया।
राजा मानसिंह प्रथम
(1589 - 1614 ई.)
राजा भगवंत दास के पुत्र अकबर के सबसे भरोसेमंद सेनापति। काबुल, बंगाल और बिहार अभियानों का नेतृत्व किया। आमेर किले का निर्माण कराया।
मिर्ज़ा राजा जयसिंह प्रथम
(1621 - 1667 ई.)
महा सिंह के पुत्र तीन मुगल बादशाहों (जहाँगीर, शाहजहाँ, औरंगजेब) की सेवा की। 1665 में शिवाजी महाराज के साथ 'पुरंदर की संधि' की।
सवाई जयसिंह द्वितीय
(1700 - 1743 ई.)
बिशन सिंह के पुत्र 1727 में जयपुर शहर बसाया। जंतर-मंतर (वेधशालाएँ) बनवाईं और 'जयसिंह कारिका' नामक खगोल ग्रंथ लिखा।
सवाई प्रताप सिंह
(1778 - 1803 ई.)
सवाई माधोसिंह प्रथम के पुत्र 1799 में प्रसिद्ध हवा महल का निर्माण कराया। इनके दरबार में 'गन्धर्व बाईसी' (22 विद्वानों का समूह) मौजूद था।
सवाई रामसिंह द्वितीय
(1835 - 1880 ई.)
सवाई जयसिंह तृतीय के पुत्र 1876 में प्रिंस ऑफ वेल्स के आगमन पर जयपुर को गुलाबी रंग से रंगवाया। महाराजा कॉलेज और अल्बर्ट हॉल की स्थापना की।
सवाई माधोसिंह द्वितीय
(1880 - 1922 ई.)
रामसिंह द्वितीय के दत्तक पुत्र इन्हें 'बब्बर शेर' कहा जाता था। इंग्लैंड यात्रा के दौरान गंगाजल ले जाने के लिए दुनिया के सबसे बड़े चांदी के पात्र बनवाए।
सवाई मानसिंह द्वितीय
(1922 - 1949 ई.)
माधोसिंह द्वितीय के दत्तक पुत्र जयपुर के अंतिम शासक। 1949 में जयपुर का राजस्थान में विलय किया और राज्य के पहले राजप्रमुख बने।

30. सिंधिया राजवंश (मराठा साम्राज्य) (1731 ई. - 1948 ई.) | शासन स्थान: उज्जैन और ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

मराठा साम्राज्य के प्रमुख स्तंभ, जिन्होंने उत्तर भारत (दिल्ली से आगरा तक) में मराठा सत्ता को चरम पर पहुँचाया।

शासक का नाम व समय पिता का नाम / पूर्वाधिकारी विशिष्ट उपलब्धि या तथ्य
राणोजी सिंधिया
(1731 - 1745 ई.)
(पेशवा बाजीराव प्रथम के सेनापति) मालवा में सिंधिया वंश की स्थापना की। उज्जैन को अपनी पहली राजधानी बनाया।
महादजी सिंधिया
(1768 - 1794 ई.)
राणोजी सिंधिया पानीपत के तीसरे युद्ध के बाद मराठा शक्ति को उत्तर भारत में पुनर्जीवित किया। दिल्ली के मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय को मराठों के संरक्षण में रखा।
दौलत राव सिंधिया
(1794 - 1827 ई.)
आनंद राव (महादजी के दत्तक पुत्र) राजधानी उज्जैन से हटाकर ग्वालियर ले गए। द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध (1803) में अंग्रेजों से हारकर सुरजी-अंजनगांव की संधि की।
जयाजीराव सिंधिया
(1843 - 1886 ई.)
जनकोजी राव द्वितीय 1857 की क्रांति के समय ग्वालियर के शासक थे। भव्य 'जय विलास पैलेस' का निर्माण कराया।
जीवाजीराव सिंधिया
(1925 - 1948 ई.)
माधवराव सिंधिया प्रथम ग्वालियर के अंतिम महाराजा। 1948 में सरदार पटेल के साथ संधि कर ग्वालियर को नवगठित मध्य भारत (भारत संघ) में मिलाया और इसके राजप्रमुख बने।

31. होल्कर राजवंश (मराठा साम्राज्य) (1731 ई. - 1948 ई.) | शासन स्थान: महेश्वर और इंदौर (मध्य प्रदेश)

मालवा क्षेत्र के प्रमुख मराठा शासक। लोकमाता अहिल्याबाई के धर्म-कार्यों और वास्तुकला ने इस राजवंश को अमर कर दिया।

शासक का नाम व समय पिता का नाम / पूर्वाधिकारी विशिष्ट उपलब्धि या तथ्य
मल्हार राव होल्कर
(1731 - 1766 ई.)
(पेशवा बाजीराव के सेनापति) मालवा के सूबेदार के रूप में होल्कर वंश की स्थापना की। इंदौर शहर को व्यापारिक केंद्र के रूप में विकसित किया।
लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर
(1767 - 1795 ई.)
मल्हार राव होल्कर की पुत्रवधू
(खांडेराव की पत्नी)
भारतीय इतिहास की सबसे महान और न्यायप्रिय महिला शासकों में से एक। राजधानी महेश्वर बनाई। काशी विश्वनाथ मंदिर, सोमनाथ और भारत भर में अनगिनत मंदिरों व घाटों का पुनर्निर्माण कराया।
यशवंत राव होल्कर प्रथम
(1797 - 1811 ई.)
तुकोजी राव होल्कर अंग्रेजों के खिलाफ आजीवन कड़ा संघर्ष किया और उन्हें कई बार हराया। (इन्हें भारत का नेपोलियन भी कहा गया)।
मल्हार राव होल्कर तृतीय
(1811 - 1833 ई.)
यशवंत राव होल्कर तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध (महिदपुर का युद्ध) में हारने के बाद 1818 में अंग्रेजों के साथ 'मंदसौर की संधि' की।
तुकोजीराव होल्कर द्वितीय
(1844 - 1886 ई.)
खंडेराव होल्कर द्वितीय इंदौर में रेलवे, अस्पताल और सूती कपड़ा मिलों की शुरुआत कर राज्य को आधुनिक बनाया।
यशवंत राव होल्कर द्वितीय
(1926 - 1948 ई.)
तुकोजीराव होल्कर तृतीय इंदौर रियासत के अंतिम शासक। 1 जनवरी 1950 को इंदौर को आधिकारिक रूप से मध्य भारत (भारत संघ) में मिला दिया गया।

32. गोंड राजवंश (गढ़ा-कटंगा) (15वीं सदी - 1789 ई.) | शासन स्थान: जबलपुर, मंडला और गोंडवाना (मध्य प्रदेश)

गोंडवाना का यह राजवंश अपने वैभव और रानी दुर्गावती के अतुलनीय शौर्य के लिए जाना जाता है, जिन्होंने अकबर की विशाल सेना से लोहा लिया था।

शासक का नाम व समय पिता का नाम / पूर्वाधिकारी विशिष्ट उपलब्धि या तथ्य
संग्राम शाह
(1482 - 1532 ई.)
अर्जुन दास 52 गढ़ों (किलों) को जीतकर गोंड साम्राज्य का सबसे अधिक विस्तार किया और उसे एक शक्तिशाली राज्य बनाया।
दलपत शाह
(1532 - 1550 ई.)
संग्राम शाह महोबा के चंदेल राजपूत वंश की राजकुमारी दुर्गावती से विवाह किया। साम्राज्य को स्थिरता और शांति दी।
महारानी दुर्गावती (संरक्षिका)
(1550 - 1564 ई.)
चंदेल राजा कीरत राय की पुत्री /
दलपत शाह की पत्नी
पति की मृत्यु के बाद अल्पवयस्क पुत्र वीर नारायण की ओर से शासन किया। मालवा के बाज बहादुर को हराया। 1564 में अकबर के सेनापति आसफ खान की विशाल सेना से भयंकर युद्ध किया और जीते जी मुगलों के हाथ न आने के लिए अपना बलिदान दे दिया।
चंद्र शाह व अन्य शासक
(1564 - 1789 ई.)
वीर नारायण के चाचा
(दलपत शाह के भाई)
मुगलों ने राज्य का कुछ हिस्सा देकर इन्हें अधीन राजा बनाया। बाद में यह राज्य कमजोर हो गया और अंततः 1789 में मराठों ने इस पर अधिकार कर लिया।

33. कित्तूर रियासत (देसाई वंश) (1585 ई. - 1824 ई.) | शासन स्थान: कित्तूर (कर्नाटक)

ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ 1857 की क्रांति से दशकों पहले ही हथियार उठाने वाली रानी चेन्नम्मा का यह राज्य भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रारंभिक केंद्रों में से एक था।

शासक का नाम व समय पिता का नाम / पूर्वाधिकारी विशिष्ट उपलब्धि या तथ्य
मल्लसर्ज देसाई
(1782 - 1816 ई.)
कित्तूर के स्थानीय देसाई
(सरदार) वंशज
कित्तूर को एक स्वतंत्र और शक्तिशाली रियासत के रूप में स्थापित किया। टीपू सुल्तान और मराठों के खिलाफ अपने राज्य को बचाया।
शिवलिंगरुद्र सर्ज
(1816 - 1824 ई.)
मल्लसर्ज देसाई और
रानी रुद्रम्मा के पुत्र
अंग्रेजों की सहायक संधि के प्रभाव में रहे। बीमारी के कारण इनकी निःसंतान मृत्यु हो गई, जिसके बाद उत्तराधिकार का संकट खड़ा हुआ।
महारानी चेन्नम्मा
(1824 ई.)
मल्लसर्ज देसाई की पत्नी अंग्रेजों द्वारा दत्तक पुत्र (शिवलिंगप्पा) को मान्यता न देने पर 1824 में सशस्त्र विद्रोह किया। पहले युद्ध में अंग्रेजों को बुरी तरह हराया और कलेक्टर जॉन थैकरे को मार गिराया। दूसरे युद्ध में अपनों के धोखे के कारण बंदी बनीं और जेल में ही उनका निधन हुआ।

34. झांसी रियासत (नेवालकर वंश) (1769 ई. - 1858 ई.) | शासन स्थान: झांसी (उत्तर प्रदेश)

मूल रूप से मराठा पेशवाओं के सूबेदार, नेवालकर वंश ने झांसी पर शासन किया। महारानी लक्ष्मीबाई के बलिदान ने इस राज्य को अमर कर दिया।

शासक का नाम व समय पिता का नाम / पूर्वाधिकारी विशिष्ट उपलब्धि या तथ्य
रघुनाथ राव नेवालकर
(1769 - 1796 ई.)
मराठा पेशवाओं के सूबेदार झांसी को एक स्वतंत्र और मजबूत रियासत का रूप दिया। रघुनाथ मंदिर और महालक्ष्मी मंदिर का निर्माण कराया।
शिवराव भाऊ व रामचंद्र राव
(1796 - 1835 ई.)
रघुनाथ राव के वंशज अंग्रेजों के साथ 1817 में संधि की और 1832 में अंग्रेजों से 'महाराजाधिराज' की उपाधि प्राप्त की।
महाराजा गंगाधर राव
(1843 - 1853 ई.)
शिवराव भाऊ के पुत्र झांसी का बहुत कुशल प्रशासन किया। खजाना भरा और सेना मजबूत की। इनका विवाह मणिकर्णिका (रानी लक्ष्मीबाई) से हुआ था।
महारानी लक्ष्मीबाई
(1853 - 1858 ई.)
मोरोपंत तांबे की पुत्री / गंगाधर राव की पत्नी डलहौजी की 'हड़प नीति' (Doctrine of Lapse) को ठुकराते हुए कहा- "मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी"। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की सबसे महान नायिका बनीं। ह्यूरोज की सेना से लड़ते हुए ग्वालियर में वीरगति प्राप्त की।

35. जाट राजवंश (सिनसिनवार वंश) (17वीं सदी - 1947 ई.) | शासन स्थान: भरतपुर, डीग और मथुरा (उत्तर प्रदेश/राजस्थान)

उत्तर भारत का यह अजेय राजवंश अपने शौर्य, मुगलों के खिलाफ सफल विद्रोह और भरतपुर के 'लोहागढ़ दुर्ग' (जिसे अंग्रेज कभी नहीं जीत पाए) के लिए इतिहास में अमर है।

शासक का नाम व समय पिता का नाम / पूर्वाधिकारी विशिष्ट उपलब्धि या तथ्य
गोकुला और राजाराम जाट
(1669 - 1688 ई.)
(स्थानीय जाट जमींदार) औरंगजेब की क्रूर नीतियों और मंदिर तोड़े जाने के खिलाफ मथुरा क्षेत्र में पहला सशक्त सशस्त्र विद्रोह किया।
राव चूड़ामन
(1695 - 1721 ई.)
भज्जा सिंह (राजाराम के भाई) जाट साम्राज्य की वास्तविक राजनीतिक नींव रखी। थून का किला बनवाया और मुगलों से स्वतंत्र सत्ता स्थापित की।
राजा बदन सिंह
(1722 - 1756 ई.)
चूड़ामन के भतीजे भरतपुर राज्य को सुदृढ़ किया। 'डीग' को राजधानी बनाया और वहाँ जलमहलों का निर्माण शुरू कराया।
महाराजा सूरजमल (सुजान सिंह)
(1756 - 1763 ई.)
बदन सिंह जाट साम्राज्य के सबसे महान शासक। इन्हें 'जाटों का प्लेटो' (Plato of Jat tribe) कहा जाता है। भरतपुर का अजेय 'लोहागढ़ किला' बनवाया और आगरा व दिल्ली तक राज्य का विस्तार किया।
महाराजा जवाहर सिंह
(1763 - 1768 ई.)
महाराजा सूरजमल पिता की मृत्यु का बदला लेने के लिए दिल्ली पर हमला किया और लाल किले से अष्टधातु के दरवाजे उखाड़कर भरतपुर ले आए (जो मूलतः चित्तौड़ के थे)।
महाराजा रणजीत सिंह
(1776 - 1805 ई.)
महाराजा केहरी सिंह अंग्रेज जनरल लेक ने 1805 में भरतपुर किले पर 5 बार भयंकर आक्रमण किया, लेकिन वह इसे जीत नहीं सका। अंततः अंग्रेजों को संधि करनी पड़ी।
महाराजा जसवंत सिंह (यशवंत सिंह)
(1851 - 1893 ई.)
महाराजा बलवंत सिंह भरतपुर राज्य का आधुनिकीकरण किया। शिक्षा और न्याय व्यवस्था में सुधार किए। इनके काल में भरतपुर राज्य का खजाना और सेना बहुत मजबूत थी।
महाराजा बृजेन्द्र सिंह
(1929 - 1947 ई.)
महाराजा किशन सिंह भरतपुर रियासत के अंतिम शासक। स्वतंत्रता के बाद 1948 में भरतपुर का 'मत्स्य संघ' (जो बाद में राजस्थान बना) में विलय कर दिया।

36. मुगल साम्राज्य (1526 ई. - 1857 ई.) | शासन स्थान: दिल्ली और आगरा

शासक का नाम व समय पिता का नाम / पूर्वाधिकारी विशिष्ट उपलब्धि या तथ्य
बाबर
(1526 - 1530 ई.)
उमर शेख मिर्जा मुगल साम्राज्य का संस्थापक। पानीपत (1526) और खानवा (1527) के युद्ध जीते। 'तुजुक-ए-बाबरी' लिखी।
हुमायूँ
(1530-1540 और 1555-1556 ई.)
बाबर का पुत्र शेरशाह सूरी से हारकर 15 वर्ष निर्वासन में रहे। 1555 में दोबारा सत्ता पाई। पुस्तकालय की सीढ़ियों से गिरकर मृत्यु हुई।
शेरशाह सूरी (अफ़ग़ान हस्तक्षेप)
(1540 - 1545 ई.)
हसन खाँ हुमायूँ को हराकर 'सूर वंश' की स्थापना की। G.T. Road बनवाई और 'रुपया' मुद्रा की शुरुआत की।
जलालुद्दीन अकबर
(1556 - 1605 ई.)
हुमायूँ का पुत्र पानीपत के दूसरे युद्ध में हेमू को हराया। मनसबदारी प्रथा, दीन-ए-इलाही और राजपूतों के साथ उदार नीति अपनाई।
जहाँगीर
(1605 - 1627 ई.)
अकबर का पुत्र न्याय की जंजीर के लिए प्रसिद्ध। चित्रकला का स्वर्ण काल। इनके समय कैप्टन हॉकिंस और थॉमस रो भारत आए।
शाहजहाँ
(1627 - 1658 ई.)
जहाँगीर का पुत्र स्थापत्य कला का स्वर्ण काल। ताजमहल, लाल किला और जामा मस्जिद का निर्माण कराया। मयूर सिंहासन (तख्त-ए-ताऊस) बनवाया।
औरंगजेब (आलमगीर)
(1658 - 1707 ई.)
शाहजहाँ का पुत्र साम्राज्य का सर्वाधिक विस्तार। जजिया कर पुनः लगाया। मराठों (शिवाजी महाराज) और सिखों (गुरु तेग बहादुर) से लंबा संघर्ष।
बहादुर शाह प्रथम (शाह आलम)
(1707 - 1712 ई.)
औरंगजेब का पुत्र इसे 'शाहे-बेखबर' कहा जाता था। औरंगजेब के बाद साम्राज्य को स्थिर करने का प्रयास किया।
मुहम्मद शाह 'रंगीला'
(1719 - 1748 ई.)
जहाँदार शाह का वंशज इनके समय 1739 में नादिर शाह ने आक्रमण किया और मयूर सिंहासन व कोहिनूर हीरा लूटकर ले गया।
शाह आलम द्वितीय
(1759 - 1806 ई.)
अजीजुद्दीन का पुत्र इन्हीं के समय पानीपत का तीसरा युद्ध (1761) और बक्सर का युद्ध
(1764) हुआ। अंग्रेजों की पेंशन पर रहने लगे।
बहादुर शाह जफर (द्वितीय)
(1837 - 1857 ई.)
अकबर द्वितीय का पुत्र अंतिम मुगल सम्राट। 1857 की क्रांति का नेतृत्व किया। अंग्रेजों ने रंगून (म्यांमार) निर्वासित किया जहाँ इनकी मृत्यु हुई।

37. मराठा साम्राज्य (1674 ई. - 1818 ई.) | शासन स्थान: रायगढ़ और पुणे (महाराष्ट्र)

शासक का नाम व समय पिता का नाम / पूर्वाधिकारी विशिष्ट उपलब्धि या तथ्य
छत्रपति शिवाजी महाराज
(1674 - 1680)
शाहजी भोंसले 'हिन्दवी स्वराज', नौसेना और गुरिल्ला युद्ध।
छत्रपति सम्भाजी, राजाराम
(1680 - 1700)
शिवाजी महाराज मुगलों से सीधा युद्ध, औरंगजेब ने सम्भाजी की हत्या की।
शाहू जी
(1708 - 1749)
सम्भाजी इनके समय सत्ता पेशवाओं (प्रधानमंत्रियों) के हाथ में आ गई।
पेशवा बाजीराव प्रथम
(1720 - 1740)
बालाजी विश्वनाथ 40 से अधिक युद्ध जीते, मराठा पताका अटक तक फहराई।
बालाजी बाजीराव, माधवराव
(1740 - 1772)
बाजीराव प्रथम पानीपत के तृतीय युद्ध (1761) में मराठों की हार। बाद में अंग्रेजों ने साम्राज्य खत्म किया।

38. सिख साम्राज्य (1799 ई. - 1849 ई.) | शासन स्थान: लाहौर (पंजाब)

शासक का नाम व समय पिता का नाम / पूर्वाधिकारी विशिष्ट उपलब्धि या तथ्य
महाराजा रणजीत सिंह
(1799 - 1839)
महा सिंह सभी 12 सिख मिसलों को एक किया, कोहिनूर हीरा वापस लाए।
खड़क सिंह, शेर सिंह
(1839 - 1843)
रणजीत सिंह दरबार में षड्यंत्रों के कारण साम्राज्य कमजोर हुआ।
दलीप सिंह
(1843 - 1849)
रणजीत सिंह अंतिम शासक, अंग्रेजों ने पंजाब को ब्रिटिश भारत में मिला लिया।

39. डोगरा राजवंश (1846 ई. - 1947 ई.) | शासन स्थान: जम्मू और कश्मीर

आधुनिक जम्मू और कश्मीर राज्य के निर्माता, जिन्होंने उत्तर-पश्चिम की सबसे विशाल और सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रियासत पर शासन किया और अंततः उसे भारत का अभिन्न अंग बनाया।

शासक का नाम व समय पिता का नाम / पूर्वाधिकारी विशिष्ट उपलब्धि या तथ्य
महाराजा गुलाब सिंह
(1846 - 1856 ई.)
किशोर सिंह जम्वाल रणजीत सिंह के सेनापति थे। 1846 की 'अमृतसर की संधि' के तहत अंग्रेजों से कश्मीर क्षेत्र प्राप्त किया और जम्मू-कश्मीर के स्वतंत्र डोगरा राज्य की नींव रखी। लद्दाख को भी अपने राज्य में मिलाया।
महाराजा रणबीर सिंह
(1856 - 1885 ई.)
महाराजा गुलाब सिंह प्रशासनिक सुधार किए और राज्य में 'रणबीर दंड संहिता' (RPC) लागू की। गिलगित और बाल्टिस्तान पर अपना नियंत्रण मजबूत किया और रेशम व कालीन उद्योग को बढ़ावा दिया।
महाराजा प्रताप सिंह
(1885 - 1925 ई.)
महाराजा रणबीर सिंह राज्य में आधुनिक बुनियादी ढाँचे का विकास किया। पहली रेलवे लाइन (जम्मू-सियालकोट), झेलम वैली कार्ट रोड और जलविद्युत परियोजनाएँ (मोहरा) इन्हीं के काल में शुरू हुईं।
महाराजा हरि सिंह
(1925 - 1947 ई.)
राजा अमर सिंह (प्रताप सिंह के भाई) अंतिम डोगरा शासक। प्राथमिक शिक्षा अनिवार्य की और छुआछूत जैसी प्रथाओं पर रोक लगाई। 1947 में पाकिस्तानी कबाइलियों के हमले के बाद, 26 अक्टूबर 1947 को 'विलय पत्र' (Instrument of Accession) पर हस्ताक्षर कर जम्मू-कश्मीर को भारत में मिला लिया।

40. ब्रिटिश राज (1757 ई. - 1947 ई.) | शासन स्थान: कलकत्ता और दिल्ली

शासक (गवर्नर जनरल/वायसराय) पूर्वाधिकारी विशिष्ट उपलब्धि या तथ्य
ईस्ट इंडिया कंपनी
(1757 - 1858)
(मुगलों व मराठों को हराया) प्लासी (1757), बक्सर (1764) जीतकर व्यापारिक कंपनी से शासक बने। डलहौजी ने राज्य हड़पे।
ब्रिटिश ताज (Crown)
(1858 - 1947)
(1857 की क्रांति के बाद) सत्ता सीधे महारानी के हाथ में। भारत का आर्थिक शोषण किया।
माउंटबेटन
(1947)
लार्ड वेवेल (वायसराय) भारत की स्वतंत्रता और विभाजन। 15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ।

The historical journey of the Indian subcontinent is a testament to its resilience and cultural depth. From the reign of Bimbisara in 600 BC to the dawn of independence in 1947, these dynasties have collectively shaped the identity of modern India. This chronological compilation is the result of extensive online research, aimed at providing a structured and reliable resource in one place for the convenience of readers.

Whether you are a student preparing for competitive exams or a history enthusiast, I hope this unified timeline serves as a valuable guide in your journey to understanding India's glorious and complex past.

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